वेदविद्यालय

हमारे सिद्धान्त

शिक्षा

उत्तम विद्या तथा उत्तम यश का समन्वय साधने वाला सेतु यह शिक्षा है। हरेक के जीवन में सार्थक एवं यथोचित शिक्षा अत्यावश्यक है ।

संस्कार

विश्व के सभी व्यक्ति व पदार्थों को उनके गुण-धर्म सहित स्वीकार करते हुए उन्हें कल्याणकारी स्वरूप प्रदान करना यह संस्कार कहलाता है।

साधना

ज्ञान से विज्ञान को साध्य कराने की प्रक्रिया साधना है। यह जीवन में आत्मिक कल्याण एवं भौतिक विकास का मार्ग प्रशस्त कराती है।

सेवा

सेवाभाव यह जीवन को सार्थकता की अनुभूति कराता है। इसलिए ज्ञान और कर्म के साथ सेवा धर्म परमावश्यक है।

उद्दिष्टः

  1. हमारी प्राचीन वेदपरम्परा, विविध प्राचीन कला तथा विद्याएं, शास्त्र, दर्शन तथा उपनिषद्, कर्मकाण्ड आदि का अध्ययन-अध्यापन, संरक्षण तथा संवर्द्धन करना।
  2. वेदों को समझकर समूचे विश्व में फैले समाज में वेदों के प्रति रूचि, श्रद्धा व अधिकार की भावना जागृत करना।
  3. ज्ञान, विज्ञान, संस्कृति, धर्म, इतिहास के साथ हर विषय में वेदाधिष्टित तत्व है और विश्व में कोई भी ऐसा विचार या विषय नहीं है, जिसका मूल व विकास वेदों में नहीं है। इस कारण इनसे जुडी सभी ज्ञान शाखाओं का अध्ययन-अध्यापन,चिन्तन मनन एवं तत्सम्बन्धी साहित्य का संरक्षण करना।
  4. विश्व की जगन्मान्य व जगत्परिचित भाषाओं में वैदिक ज्ञान का प्रचार तथा प्रसार करने हेतु वेदों को समझने वाली, जानने वाली और वेदों का निःस्पृह भाव से प्रचार व प्रसार करने वाली एक नहीं अनेक टोलियाँ बने यह इस योजना का उद्दिष्ट है।
  5. इसे देखते हुए श्री जगदीशप्रसाद झाबरमल टीबडेवाला वेदविद्यालय में वैदिक शिक्षा के साथ साथ आधुनिक शिक्षा का प्रावधान भी चल रहा है। जिससे प्राचीन ज्ञान के साथ साथ आधुनिक ज्ञान से सम्पन्न सुशिक्षित नागरिकों का निर्माण किया जा सके।